कमांडो राकेश्वर सिंह ने सुनाई पूरी कहानी, नक्सलियों ने कैसे किया रिहा

नक्सलियों से रिहाई की कहानी कमांडो राकेश्वर सिंह ने सुनाई। छत्तीसगढ़ के बीजापुर में हुई देश को झकझोर देने वाली घटना में अपहृत हुए थे कोबरा कमाण्डो।

सिंगरौली। बीते 3 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के तर्रम इलाके में नक्सलियों के साथ हुई अप्रत्याशित गुरिल्ला मुठभेड़ में दो दर्जन से अधिक जांबाज सुरक्षा जवानों की शहादत हुई थी। इसी दौरान माओवादियों ने कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह मनहास का अपहरण कर लिया था।

गुरुवार 8 अप्रैल को सकुशल लौटकर आए राकेश्वर सिंह मनहास 6 दिनों तक नक्सलियों के कब्जे में थे। कमाण्डो मनहास ने वापस लौट कर नक्सलियों के बीच बिताए इन 6 दिनों के ब्योरे को विस्तार से बताया। नक्सलियों ने मनहास को बस्तर के गांधी कहे जाने वाले धर्मपाल सैनी के हवाले किया था जहाँ से उन्हें आजाद किया गया।

वो छ: दिन

कोबरा कमाण्डो राकेश्वर सिंह मनहास ने बताया कि इन 6 दिनों में उनके साथ किसी तरह की मारपीट नहीं की गई। 3 अप्रैल को मुठभेड़ के दौरान वे नक्सलियों के बीच घिर गए थे। जिसके बाद उन्हें शांति से आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया था। उन्हें कलगुड़ा जोनागुड़ा गांव के पास से नक्सलियों ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था। आँखों पर पट्टी बांधकर वहाँ से उन्हें कहां कहां ले जाया गया इसकी उन्हें सही सही जानकारी नहीं है।

कमांडो मनहास के मुताबिक नक्सली ज्यादातर स्थानीय बोली में बात कर रहे थे। इसलिए उन्हें अधिकतर बातें समझ में नहीं आ रही थीं। उन्हें जब भी एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाया जाता तो आंखों पर पट्टी बांध दी जाती थी। नक्सलियों ने आपस में बातचीत के बाद फैसला लिया था कि मनहास को सुरक्षित लौटा दिया जाए। लेकिन इसके लिए मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग की थी।

पद्मश्री धर्मपाल सैनी बने मध्यस्थ

गांधीवादी कार्यकर्ता धर्मपाल सैनी और घोड़ा वाला गोंडवाना समाज के प्रमुख मुरैया तरेम के अलावा सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी और कुछ अन्य लोगों की सहायता से नक्सलियों के साथ बातचीत की गई थी। यह लोग नक्सलियों से मिलने जंगलों में भी गए थे। हालांकि नक्सलियों के मनहास को छोड़ने के लिए अदालत भी लगाई गई थी। 91 वर्षीय धर्मपाल सैनी बस्तर के जाने-माने गांधीवादी कार्यकर्ता हैं। वे आचार्य बिनोवा भावे के शिष्य रहे हैं और बस्तर में महिला शिक्षा के लिए वर्ष 1979 से अहम काम कर रहे हैं। साल 1992 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था।

नक्सलियों ने अपनी अदालत लगाई, फिर छोड़ा

धर्मपाल सैनी और मुरैया तरेम के साथ बातचीत के बाद भी नक्सलियों ने जन अदालत लगाया और अपनी ही अदालत के फैसले के बाद मनहास को रिहा किया था।

प्राप्त जानकारी के अनुसार नक्सलियों की पामेड़ एरिया कमेटी ने गुरुवार को टेकलमेटा गांव के पास जंगल में 20 गांवों से आदिवासियों को बुलाकर जन अदालत लगाई थी। जवान राकेश्वर सिंह मनहास को बाइक से तरेम कैंप लाकर सीआरपीएफ के डीआईजी कोमल सिंह को सौंपा गया था। मनहास की वापसी के दौरान काफी भीड़ भी जमा हो गई थी। बहरहाल नक्सलियों द्वारा सुरक्षा दल के जवानों के साथ खेली गई खूनी होली के बीच उनके हाथ आए जवान की अहिंसक रिहाई, कई सवाल भी खड़े कर रही है। संभव है कि वे गृहमंत्री अमित शाह के दौरे से परेशान हुए हों और इस बात को लेकर भयभीत हुए हों कि जवान की खोज में पैरा मिलिटरी फोर्स कोई बहुत बड़ी कार्रवाई न कर दे।

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